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नोटा से निपटने चुनाव आयोग ने शुरू किया महामंथन

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नई दिल्ली!नोटा से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने महामंथन प्रारंभ किया है. आने वाले समय में नोटा एक बड़ी समस्या खड़ी कर सकती है. ऐसे में नोटा का समाधान क्या हो, चुनाव आयोग इसपर बड़ी गंभीरता से सोच रहा है. यही नहीं आयोग इस मामले में कुछ कानूनी संशोधन के लिए भी सरकार से सिफारिस करने की योजना बना रहा है.

अगर किसी विधानसभा या लोकसभा सीट पर नोटा को विजयी प्रत्याशी से ज्यादा वोट पड़ते हैं, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? इस बात को लेकर अब चुनाव आयोग गंभीर दिखने लगा है. मसलन चुनाव आयोग ने इस विषय पर गहन मंथन प्रारंभ कर दिया है. आयोग ने ऐसे हालात के लिए राजनीतिक दलों से सुझाव भी मांगे हैं. वहीं पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ऐसे हालात में दोबारा वोटिंग नहीं कराने की सलाह दे रहे हैं.

आपको बता दें कि 2013 में नोटा लागू होने के बाद से अभी तक सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में 1.33 करोड़ से ज्यादा नोटा वोट पड़ चुके हैं. वहीं इस बार हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 4 लाख 39 हजार 296 वोट नोटा को गए हैं.

हाल ही में हरियाणा राज्य चुनाव आयोग ने पांच जिलों में होने वाले नगर निगम चुनाव में नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में दोबारा चुनाव कराने का फैसला किया है. राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने नोटा को एक प्रत्याशी की तरह गिनने का फैसला किया है. साथ ही कहा है कि ऐसे हालात में पहले वाले सभी प्रत्याशी अयोग्य घोषित हो जाएंगे.

इससे पहले देश में पहली बार महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने भी ऐसा ही फैसला दिया था, जिसमें नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में स्थानीय निकाय चुनावों को फिर से कराया जाए और चुनाव में कोई भी विजयी घोषित नहीं किया जाएगा.

हालांकि नोटा कानून में इस स्थिति को लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है. चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि आयोग के पास सभी विकल्प खुले हुए हैं. आयोग भी चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम संख्या 64 में संशोधन का पक्षधर है और जल्द ही संशोधनों को प्रस्तावित करेगा.

वहीं पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी, महाराष्ट्र और हरियाणा राज्य चुनाव आयोग के फैसलों को गलत ठहराते हैं. उनका कहना है कि ऐसे हालात में दोबारा वोटिंग करना अवैध है. कुरैशी के मुताबिक नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में दोबारा चुनाव कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि अगर किसी चुनाव में 100 में से नोटा को 99 वोट मिलते हैं और प्रत्याशी को एक वोट मिलता है, तो ऐसे में प्रत्याशी को विजयी माना जाएगा.

जून 2010 से जुलाई 2012 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे कुरैशी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि नोटा, नकारात्मक विचार रजिस्टर रखने का अधिकार है. उन्होंने बताया कि नोटा को ज्यादा वोट मिलने से सभी प्रत्याशी की हार नहीं मानी जा सकती या चुनाव रद्द नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि नोटा का मतलब होता है कि वोटर खुद को उस चुनाव से अलग रखना चाहता है और अपनी गोपनीयता सुनिश्चित रखना चाहता है, ताकि कोई उसकी जगह फजीज़् वोट न डाल सके.

आयोग के सूत्रों का कहना है कि उसके पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वह फिर से चुनाव करवा सके. उनका कहना है कि नोटा की पवित्रता को बनाए रखने और यहां तक कि नए चुनावों का आदेश देने के लिए नियम 64 में बदलाव करने होंगे और इसके लिए संसद की मुहर लगनी जरूरी नहीं है, बल्कि कानून मंत्रालय ही इसे मंजूरी दे सकता है.

चुनाव के परिणाम और चुनाव की वापसी की घोषणा पर नियम 64 कहता है कि रिटनिंज़्ग अफसर के पास उसी प्रत्याशी को विजयी घोषित कर सकता है जिसे सबसे ज्यादा वैध वोट मिले हों. साथ ही नियम 64 में इस बात कोई उल्लेख नहीं है कि नोटा को ज्यादा वोट मिलने की स्थिति में क्या किया जाए.

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