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देश के अहम सूबे में सपा और बसपा का रवैया, डूबा सकता है कांग्रेस के महागठबंधन की नैया

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डेस्क। देश के सबसे बड़े और अहम सूबे यानि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की कोशिशों के परवान चढ़ने की उम्मीद बेहद ही कम और तकरीबन बेदम सी नजर ही है क्योंकि सूबे में भाजपा के मुकाबले सपा और बसपा अपने ही गठबंधन को काफी हद तक बेहतर और मजबूत मान रहे हैं जिसमें रालोद और लोद जैसे दल तो शामिल हैं ही लेकिन वहीं दशकों तक देश और प्रदेश में बखूबी राज करने वाली कांग्रेस से हाथ मिलाने को लेकर सपा और बसपा अभी हाल फिलहाल हाथ मिलाने के कतई इच्छुक नजर नही रहे हैं। दरअसल उनका मानना है कि मौजूदा परिदृश्य में कांग्रेस उनको उतनी मजबूत नजर नही रही है।

गौरतलब है कि जहां एक तरफ कांग्रेस तथा कई अन्य क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप देश भर में भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर महागठबंधन बनाये जाने पर कवायदों में जुटे हैं वहीं केन्द्र की सत्ता तक पहुंचाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले सूबे उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों की कवायद अभी से दम तोड़ती नजर रही है। क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस के प्रति जिस तरह से फिलहाल सपा और बसपा का रवैया रहा है उससे साफ जाहिर होता है कि वो उत्तर प्रदेश में भाजपा से मुकाबला महज अपने गठबंधन और कुछ सहयोगी दल जिनके साथ वो पहले ही गठबंधन में गठजोड़ कर चुके हैं उनके ही बूते करने का मन बना चुके हैं।

अगर जानकारों की मानें तो उत्तर प्रदेश के हाल के विधान सभा चुनाव में सपा द्वारा कांग्रेस के साथ चुनाव में उतरने के परिणाम उम्मीद से कहीं ज्यादा नुक्सानदायक साबित हुए थे। जिसके चलते ही अखिलेशयूपी को साथ पसंद हैके प्लॉप शो के बाद कांग्रेस को लेकर अपना रुख बदलने लगे और अपने चिरप्रतिद्वंदी मायावती के करीब जाने की कोशिश में जुट गए। कांग्रेस पर पूछे जाने वाले सवालों को टाल देते और मायावती के साथ गठबंधन पर बातें शुरू कर देते।

इतना ही नही सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरें भी आईं कि अखिलेश कांग्रेस को गठबंधन में नहीं रखना चाहते। हालांकि बावजूद इसके कई मौके ऐसे भी आऐ जैसे कि लोकसभा उपचुनाव में, अविश्वास प्रस्ताव, राज्य सभा चुनाव और राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव जिसमें सपाकांग्रेस साथसाथ दिखे और लोगों को इसका भ्रम हुआ कि शायद फिर से बात बन जाऐ।

लेकिन ये सारे भ्रम हाल के कांग्रेस द्वारा आहुत भारत बंद के दौरान दूर हो गए। जब बंद के सपाकांग्रेस अलगअलग रहीं। कांग्रेस के इस महत्वाकांक्षी अभियान में ना तो अखिलेश की पार्टी दिखी और ना ही मायावती दिखीं। दिल्ली के रामलीला मैदान में जब सारे दिग्गज नेता हाथों में हाथ लिए फोटों सेशन कर रहे थे तो सपाबसपा के प्रतिनिधि नदारद दिखे। वहीं उत्तर प्रदेश में दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता भी इस बंद में शामिल नहीं रहे। अखिलेश और मायावती भी अपने अलगअलग कार्यक्रम में वयस्त रहे।

कर्नाटक चुनाव और कुमारास्वामी की शपथ ग्रहण के दौरान जिस तरह से मायावती और सोनिया गांधी की नजदीकियां सामने आईं तो उससे काफी हद तक इस बात को बल मिला था कि कांग्रेस के प्रति उनका नरम रवैया है। लेकिन हाल के कांग्रेस आहुत भारत बंद के दौरान जिस तरह से बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी दूरी बनाए रखी और उस दिन जो बयान दिया उसने काफी हद तक कांग्रेस को सदमे में डाल दिया।

दरअसल भारत बंद के बाद बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने केंद्र सरकार को कांग्रेस की राह पर चलने वाला बताया और निशाना साधते हुए कहा कि पूंजीपतियों को नाराज नहीं करना चाहती है बीजेपी इसी वजह से पेट्रोलडीजल के दामों में कटौती नहीं कर रही है। मायावती ने आगे कहा कि कांग्रेस ने पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया था जिसके बाद मोदी सरकार ने उस पर कोई बदलाव नहीं किया बल्कि उसी की राह पर आगे बढ़ते हुए डीजल को भी सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया। बड़ी बात यह रही कि अखिलेश यादव ने भी मायावती की इस बात पर सहमति जता दी।

मायावती के इस बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाए रखना चाहती हैं। इसके अलावा एक संकेत यह भी निकल कर रहा है कि शायद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव में गठबंधन होने की स्थिति में कांग्रेस पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाना है। पर फिलहाल के परिदृश्य में देखें तो राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस को यूपी से अच्छे संकेत नहीं मिल रहे जिसका खामियाजा आने वाले चुनाव में उठाना पड़ सकता है।

ज्ञात हो कि इन्हीं बातों को देखते हुए ही कुछ समय पूर्व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद द्वारा बयान दिया गया था कि सपा और बसपा जिस तरह का रवैया कांग्रेस के प्रति दिखा रहे हैं उस पर उनको बखूबी गौर करना चाहिए।

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