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आयुर्वेद के अनुसार बिताएं दिन और पाएं निरोगी काया

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आयुर्वेद में सेहत के लिए एक अलग दृष्टिकोण है. इसमें बीमारी के इलाज की तुलना में  उसकी रोकथाम अधिक मायने रखती है. इसके लिए हमें खुद की आदतों को बड़े तौर पर बदलने की जरूरत पड़ती है. इसमें यह अहम होता है कि हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी को कैसे जीते हैं. आयुर्वेद का मुख्य कांसेप्ट ही रूटीन यानी दिनचर्या पर आधारित है. इसमें हमें हेल्दी लाइफ स्टाइल टिप्स अपनाने को कहा जाता है. मसलन यह सेहतमंदी को बढ़ावा देने और बीमारियों को रोकने के लिए रोजाना पौष्टिक आहार, एक्सरसाइज और सेहतममंद आदतों को अपनाने पर जोर देता है. अगर आप भी ऐसी ही हेल्दी लाइफ जीना चाहते हैं तो यहां हम ऐसे ही सेहतमंदी से जुड़े रूटीन के बारे में आपको बताएंगे.

अपने दिन की शुरुआत सही वक्त पर करेंः

रूटीन के मुताबिक, किसी व्यक्ति के जागने का सबसे अच्छा समय सुबह 3 से 6 बजे के बीच है. यह इसलिए है क्योंकि दिन को आयुर्वेद में छह खंडों में विभाजित किया गया है, जिसके अनुसार तीनों दोष अलग-अलग समय पर हावी हैं. सुबह 6 से 10 बजे के बीच, कफ दोष हावी हो जाता है, इस समय जागने वाला व्यक्ति सुस्त और धीमी गति से सक्रिय हो पाता है. सुबह 10 से 2 बजे के बीच, पित्त दोष हावी हो जाता है, इस वक्त में जागने वाले व्यक्ति को अधिक प्रतिकूलता और अधीर महसूस होता है. दूसरी ओर, एक व्यक्ति जो सुबह 6 बजे से पहले वात दोष के दौरान उठता है, वह ऊर्जावान, जागृत और जोशपूर्ण महसूस करता है.

जल्दी खाओ, सही खाओः  

दिनचर्या के प्राथमिक पहलुओं में से एक है आहार सेवन या खाना खाना. पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथ हमें दिन में केवल दो बार खाना खाने की सलाह देते हैं, अधिकांशतः सुबह और शाम को सूरज निकलने से पहले. जबकि हम इस सलाह को अपने मुताबिक ढाल कर ही खाना खाने को तवज्जो देते हैं. इसके लिए हम बिजली को भले ही धन्यवाद दें, लेकिन अभी भी शाम को दिन ढलने से पहले भोजन करने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा आयुर्वेद हमें संतुलित तौर पर और खाने में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों को शामिल करने की सलाह देता है. इसका सर्वग्रह का सिद्धांत हमें बताता है कि पेट का एक तिहाई ठोस खाने से भरा होना चाहिए, एक तिहाई तरल पदार्थ से भरा होना चाहिए और एक तिहाई खाली रहना चाहिए.

शरीर को साफ करनाः  

खाने के अलावा सेहतमंद रहने के लिए कई अन्य पहलू भी हैं, जिनकी बात हम रूटीन या दिनचर्या में करते हैं. आयुर्वेद में एक बार सुबह शरीर के हरकत में आने के बाद शरीर की शुद्धता, स्वच्छता और फिटनेस को बनाए रखने के लिए कई तरह की परहेजों की सिफारिश की जाती है. ब्रश करने से दांत साफ होते हैं तो आंखों में काजल लगाने से आंखों की सफाई होती है. इसी तरह नाक में नेजल ड्राप्स डालने से नाक साफ होती है. रोजाना गरारे करने से गला साफ हो जाता है. पान को इलायची व लौंग के  साथ चबाने से पाचन क्रिया में मदद मिलती है, रोजाना तिल की तेल की मसाज सिर, कान और पैरों के तलवों में करने से थकावट दूर होती है और यह एंटी-एजिंग के लिए भी बढ़िया मानी जाती है.  यह मसाज अच्छे विजन, शरीर के ऊतकों के पोषण, अच्छी नींद और स्वस्थ त्वचा में भी योगदान देती है.

हल्की एक्सरसाइज – रोजाना की गई हल्की एक्सरसाइज से शरीर हल्का रहता है, काम करने की क्षमता बढ़ती है. पाचन में सुधार आने के साथ ही अतिरिक्त चर्बी भी गलती है. इससे शरीर को सुडौल बनाने में भी मदद मिलती है.उदावर्तना या त्वचा पर बेसन और हरे चने के पाउडर के रूप में सूखे पाउडर के इस्तेमाल से शरीर की  से कफ प्रवृत्ति में कमी आती है. इससे डेड स्किन सेल बाहर निकालने में मदद मिलती है. ये अतिरिक्त तेल और वसा को हटाने में मदद करते हैं और त्वचा की सेहत सुधरती है सो अलग.गर्म पानी से नहाने से  भूख और शक्ति बढ़ती है और लाइफ स्पैन बढ़ाने में मदद मिलती है.त्वचा की सफाई होती है, थकावट, रूखापन कम होता है, इसलिए रोज नहाने को भी अपना रूटीन बनाएं भले ही ठंड का मौसम ही क्यों न हो.

आयुर्वेद रूटीन है सुरक्षाः  

ऐसे समय में जब हम सभी संक्रमण की संभावना के बारे में सतर्क हो रहे हैं, आयुर्वेद में दैनिक आदतों पर बहुत जरूरी सलाहें दी गई हैं जो स्वच्छता को बढ़ावा दे सकती हैं, प्रतिरक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं और बीमारी को रोक सकते हैं. इन पारंपरिक प्रथाओं और हेल्दी लाइफ स्टाइल की तरफ मुड़ना सेहतमंदी का बेहतरीन रास्ता हो सकता है.

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