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चांद-तारे वाले झंडों के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा केंद्र से जवाब

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नई दिल्ली। शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी अपनी वाजिब बातों और मांगों के चलते भले ही तमाम दुकानें चलाने वालों की आखों में कांटा बनकर खटकने लगे हों लेकिन वो अपनी मुहिम में बखूबी जुटे हैं। इसी क्रम में उनकी एक याचिका पर अब देश की सर्वोच्च अदालत ने केन्द्र की सरकार से जवाब मांगा है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की उस याचिका पर आज केंद्र से जवाब मांगा जिसमें देशभर की इमारतों और धार्मिक स्थानों पर चांद तारे वाला हरे रंग का झंडा फहराने पर रोक लगाने की मांग की गई है।

आज न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद वसीम रिजवी की ओर से पेश हुए वकील से याचिका की एक प्रति अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को देने के लिए कहा ताकि वह केंद्र की तरफ से जवाब दे सकें।

दरअसल रिजवी ने अपनी याचिका में दावा किया कि चांद और तारे वाला हरे रंग का झंडा गैर इस्लामी है और यह पाकिस्तान के एक राजनीतिक दल के झंडे जैसा दिखता है। उन्होंने अपनी याचिका में यह भी दावा किया कि मुंबई और देश में अन्य स्थानों के दौरे के दौरान उन्होंने पाया कि कई इमारतों तथा धार्मिक स्थानों पर ये झंडे हैं जिनसे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कथित तौर पर तनाव पैदा हो रहा है।

इतना ही नही उनकी याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये झंडे शत्रु देश की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के झंडों की तरह दिखते हैं। इसमें दावा किया गया है कि हरे रंग के अर्द्धचंद्र सितारे वाले झंडे की उत्पत्ति राजनीतिक दल मुस्लिम लीग से हुई जिसकी स्थापना 1906 में नवाज वकार उल-मलिक और मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी।

जबकि मौजूदा समय में भारतीय मुस्लिम इसका इस्तेमाल कर रहे हैं जो इसे इस्लामी झंडा मानते हैं। याचिका में कहा गया है कि हरे रंग की पृष्ठभूमि में चांद और तारा कभी किसी इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहा और इसकी इस्लाम में कोई भूमिका या कोई महत्व नहीं है। साथ ही ये भी कहा गया है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में ऐसे झंडे पूरी छूट के साथ फहराए जाते हैं।

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