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सीज फायर के बाद BJP के बड़े फायर से घाटी में जलजला, पीडीपी से अलग होने का लिया फैसला

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नई दिल्ली। रमजान माह के सीज फायर के खत्म होने के साथ ही आज जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी गठबंधन सरकार का गठबंधन भी समाप्त हो गया। दरअसल भाजपा ने पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया है। भाजपा ने समर्थन वापसी की चिठ्ठी राज्यपाल को सौंप दी है। वहीं महबूबा ने अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप शाम को  पार्टी की बैठक बुलाई हैं जिसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जायेगा।

इस बाबत जानकारी देते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव ने कहा कि हमने कश्मीर में गठबंधन शांति स्थापित करने के लिए किया था और हमने हर वो संभाव कोशिशें भी करी कि वहां बखूबी शांति स्थापित हो सके। लेकिन बावजूद इसके वहां कोई अपेक्षित परिणाम मिलते नही नजर आये बल्कि अपना दायित्व निभाने में पीडीपी नेता और मुख्यमंत्री महबूबा पूरी तरह से नाकाम रही हैं।

उन्होंने कहा कि खासकर कश्मीर में आतंकवाद और कट्टरवाद में बढ़ोत्तरी का होना एक बड़ी समस्या बनने लगी थी। हालांकि हमारी तरफ से तमाम विरोधों के बावजूद रमजान माह की पाकीजगी के मद्देनजर सीज फायर को लागू किया गया ताकि घाटी के लोगों को यह साफ जाहिर हो सके कि हम वाकई में शांति के पक्षधर हैं।

उन्होंने कहा लेकिन बावजूद इसके वहां नापाक आतंकियों ने रमजान माह की पाकीजगी को भी नजरअंदाज कर लगातार हमले किये जो साफ जाहिर करने वाला था कि इनके लिए हमारे प्रयासों का कोई मतलब ही नही है। वहीं हाल में पत्रकार शुजात बुखारी और जवान औरंगजेब की हत्या ने तो आतंकियों और उनके समर्थकों के मंसूबे साफ जाहिर कर दिये।

वरिष्ठ नेता ने माना कि मौजूदा सरकार भाजपा हाईकमान की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई है। जो लक्ष्य लेकर राष्ट्रीय पार्टी ने सरकार बनाई , उन्हें हासिल करना अभी संभव नहीं हुआ। इससे पार्टी की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था व इसे बड़ी गंभीरता से लिया जा रहा था।  वहीं महबूबा द्वारा लगातार घाटी से सेना को कम करने का दबाव बनाये जाना कहीं न कहीं गैर वाजिब मांग ही थी।

गौरतलब जम्मू कश्मीर में तेज विकास व पारदर्शी प्रशासन के लक्ष्य के साथ पीडीपी से गठजोड़ करने वाला भाजपा हाईकमान महबूबा सरकार के कश्मीर केंद्रित रवैये से नाराज है। ऐसे हालात में कड़े तेवर दिखाते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं व मंत्रियों को अचानक दिल्ली तलब कर लिया है। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी मंगलवार सुबह अमित शाह के घर जाकर उनसे मुलाकात की है। फिलहाल यह साफ नहीं हुआ है कि इस मुलाकात में क्या बात हुई।

राज्य में पार्टी ने संसदीय चुनाव की तैयारियों को तेजी देने की मुहिम चलाई , ऐसे में पीडीपी ने अपने काम करने के तरीके में बदलाव न लाया तो भाजपा के लिए जम्मू संभाग में लोगों के बीच जाना मुश्किल हो जाता। ऐसे में भाजपा के लिए कोई बड़ा फैसला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।  भाजपा अपने राजनीतिक भविष्य की बेहतरी के लिए कोई ठोस कदम उठाना ही अब विकल्प बचा था।

इन हालात में अमित शाह मंगलवार को दिल्ली में प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं, मंत्रियों के साथ बैठक में राजनीतिक हालात, सरकार के कामकाज संबंधी मुद्दों पर चर्चा की। बैठक में हिस्सा लेने के लिए प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना के नेतृत्व में पार्टी के वरिष्ठ नेता के साथ उपमुख्यमंत्री कविंद्र गुप्ता भी सोमवार शाम को दिल्ली पहुच गए थे।

अमित शाह की बैठक को इसलिए भी अहम माना जा रहा था क्योंकि उन्होंने जम्मू दौरे से ठीक चार दिन पहले नेताओं, मंत्रियों को दिल्ली तलब कर संकेत दिया है कि मामला गंभीर है। सूत्रों के अनुसार, पीडीपी ने पहले पत्थरबाजों की रिहाई, कठुआ मामले, सरकारी भूमि से गुज्जर, बक्करवालों को न हटाने जैसे फैसले कर भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा की थीं। अब रमजान में संघर्षविराम व धार्मिक संगठन अहले हदीस को सरकारी भूमि देने के मामले में भी पीडीपी ने मनमर्जी की है।

भाजपा इतना सब होने के बाद भी सरकार को श्री बाबा अमरनाथ भूमि आंदोलन में हिस्सा लेने वाले युवाओं के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए राजी नहीं कर पाई। इससे भाजपा आधार क्षेत्र जम्मू में घिर रही है। इतना ही नही प्रधानमंत्री पैकेज के इस्तेमाल के मामले में सरकार नाकाम रही है व संसदीय चुनाव में इस मुद्दे का तूल पकड़ना तय है।

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