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अब शर्तों पर जारी रख सकते हैं सांसद और विधायक वकालत बीसीआई की मंजूरी

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नई दिल्ली!  आज सांसदों एवं विधायकों को वकीलों के रूप में काम करने की मंजूरी देने के फैसले पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने मोहर लगा दी. हालांकि कोर्ट ने कहा कि उच्च ऐसे सांसदों एवं विधायकों को न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले को उस अदालत में वकालत करने की मंजूरी नहीं होगी.

मिश्रा ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘ बीसीआई इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंची है कि हम सांसदों, विधायकों को अदालतों में वकालत करने से रोक नहीं सकते या उन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते, लेकिन इसे लेकर एक अपवाद है. वकील- सांसद या वकील- विधायक, अगर वे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग या पद से हटाने की कार्यवाही का प्रस्ताव लाते हैं तो उन्हें उस खास अदालत में वकालत करने की मंजूरी नहीं होगा. यह काउंसिल के अधिकतर सदस्यों का रुख है.’’

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक याचिका को लेकर इसस मामले में 12 मार्च को बीसीआई से जवाब मांगा था. याचिका में सांसदों या विधायकों के वकीलों के रूप में काम करने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी.

क्या है नियम

हाल ही में भारत के मौजूदा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस द्वारा महाभियोग लाने के बाद यह प्रक्रिया चर्चा का विषय बनी हुई है. नियम के मुताबिक सीजेआई के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों के और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की आवश्यकता होती है. उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के परामर्शानुसार की जाती है.

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस प्रसंग में राष्ट्रपति को परामर्श देने से पूर्व अनिवार्य रूप से चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह से परामर्श प्राप्त करते हैं तथा इस समूह से प्राप्त परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति को परामर्श देते हैं. अनुछेद 124 के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह लेगा. वहीं अन्य जजों की नियुक्ति के समय उसे अनिवार्य रूप से मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी पड़ेगी.

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