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भाजपा को पूरी तरह से बैकफुट पर लाने को, कांग्रेस राजी हो रही बसपा के साथ आने को

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नई दिल्ली। बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा भाजपा को घेरने की रणनीति अब सभी भाजपा विरोधी दलों को काफी रास आ रही है जिसके चलते दूर-दूर रहने वाली तमाम विरोधी पार्टियां अब पास-पास आ रही हैं क्योंकि लोगों ने बखूबी देखा कि कैसे मायावती ने उत्तर प्रदेश में बेहद अहम उपचुनाव में सपा से गठबंधन कर भाजपा को करारी शिकस्त दी और कर्नाटक में भी चुनाव परिणामों के साथ ही जेडीएस और कांग्रेस को गठबंधन के लिए राजी कर एक बार फिर से भाजपा को बैकफुट पर ला दिया।

गौरतलब है कि बसपा सुप्रीमों मायावती की इसी कामयाब रणनीति के चलते अब कांग्रेस तीन राज्यों के आगामी चुनाव में क्षेत्रीय दलों तथा बसपा के साथ हाथ मिलाने का काफी हद तक मन बना चुकी है बस इसकी औपचारिक घोषणा मात्र ही बाकी बची है। सूत्रों के मुताबिक कर्नाटक में सियासी उठापटक के बाद कांग्रेस ने अब गठबंधन की राजनीति की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। जिसके तहत तय माना जा रहा है कि अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस क्षेत्रीय दल बसपा के साथ गठबंधन करेगी। ताकि इन भाजपा को इन राज्यों में सत्ता तक पहुंचने से रोका जा सके।

सियासी जानकारों की मानें तो उनके हिसाब से कांग्रेस को अगर वाकई में बसपा का साथ मिल गया तो साल के अंत में होने वाले तीन राज्यों के चुनाव में भाजपा की न सिर्फ राह राह दुश्वार हो जायेगी बल्कि काफी हद तक इस गठबंधन  की नइया पार हो जायेगी। दरअसल ऐसा इसलिए प्रतीत हो रहा है क्योंकि तीनों राज्यों में दोनों पार्टियों के आपस में मिलने के बाद वोट शेयरिंग का जो आंकड़ा है उसके मुताबिक कुछ ऐसा ही है।

जैसा कि फिलहाल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों ही राज्यों में भाजपा की  सरकार है। उसके लिहाज से तीनों ही राज्य बीजेपी के वोट शेयर के हिसाब से महत्वपूर्ण राज्य के रूप में पार्टी की ओर से देखा जाता है। इसका परिणाम भी पार्टी को चुनाव में मिलता रहा  है। लेकिन इन राज्यों में 2003 के बाद से प्रमुख दल कांग्रेस-भाजपा के साथ ही बसपा के वोट शेयर को देखें तो हालात भाजपा के लिए चौंकाने वाले नजर आ रहे हैं।

बेहद अहम है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2003 के बाद से अब तक की स्थिति को देखें तो कांग्रेस और बसपा के आपस में जुड़ने से वोट शेयरिंग चौंकाने वाला परिणाम दे रहा है।  सबसे पहले अगर हम राजस्थान के आंकड़ों पर गौर करें तो जैसा कि यहां वर्ष 2003 में भाजपा का वोट 39.20 फीसदी रहा है, वहीं कांग्रेस-बसपा का वोट शेयर जोड़कर देखें तो 39.62 फीसदी रहता है।  इसी प्रकार से अगर 2008 में जहां  भाजपा का वोट 34.27 फीसदी रहा  तो वहीं कांग्रेस और बसपा के वोट शेयर 44.42 फीसदी रहा। जबकि पिछले 2013 के चुनाव में जहां भाजपा का वोट 45.17 फीसदी रहा था वहीं कांग्रेस-बसपा  का वोट शेयर 36.44 फीसदी रहा।

इसी के साथ अगर मध्यप्रदेश की बात करें तो वहां वर्ष 2003 में  भाजपा का वोट 42.5 फीसदी था जबकि कांग्रेस-बसपा का वोट शेयर 38.87 फीसदी था।  वहीं वर्ष 2008 में भाजपा का वोट 37.64 फीसदी रहा था जबकि कांग्रेस-बसपा को जोड़कर देखें तो 41.36 फीसदी रहा । जबकि पिछले 2013 में यहां भाजपा का वोट 44.88 फीसदी रहा, वहीं कांग्रेस-बसपा का 42.67 फीसदी रहा।

जबकि इसी प्रकार से अगर हम छत्तीसगढ़ में वोट शेयर के मामले में कांग्रेस और बसपा को जोड़कर देखें तो 2003 से 2013 के बीच में दोनों दल हमेशा आगे ही रहे हैं। जिसके चलते जहां  2003 में भाजपा का वोट 39.26 फीसदी था जबकि कांग्रेस और बसपा का वोट शेयर 41.16 फीसदी तथा । वहीं वर्ष 2008 में भाजपा का वोट 40.33  फीसदी रहा तो कांग्रेस-बसपा वोट शेयर 44.74 फीसदी रहा था। जबकि वर्ष 2013 में भाजपा का वोट शेयर 41.04 फीसदी रहा था तो वहीं कांग्रेस और बसपा का वोट शेयर 44.56 था है।

जानकारों के मुताबिक इन आंकड़ों पर अगर बखूबी गौर किया जाये तो इससे साफ प्रतीत होता है कि अगर वाकई में कांग्रेस और बसपा ने इन तीन राज्यों के चुनावों में हाथ मिला लिया और इसी प्रकार से राज्यवार क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस में सहमति बन गई तो भाजपा के लिये न सिर्फ राज्यों के चुनावों में बल्कि आगामी 2019 के लोकसभा चुनावों में भी भारी मुश्किलों से होना पड़ेगा दो-चार, कोई बड़ी बात नही कि इसके चलते हो जाये भाजपा की हार।

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